Poetry

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“सुबह की सैर “



सुबह का वो समय था,
आंखों में नींद थी,
पर नींद नहीं आ रही थी,
मैं बस चला जा रहा था।
कॉलेज हमारा सुबह कितना मस्त लग रहा था,
मैं चल रहा था ,
मंदिर की सुबह की घंटी की आवाज आ रही थी,
चिड़ियों की चहचहाट,
पेड़ों में वसंत ऋतु की हरियाली,
वो खाली सुनसान सड़कें,
वो कॉलेज की इमारतें,
सब बहुत अच्छा लग रहा था।
और मैं बस चला जा रहा था,
आंखों में नींद को लेके,
इधर उधर देखा जा रहा था,
सब कितना अच्छा लग रहा था।
सूरज की किरणें आने लगी थी,
मेरी आंखों की नींद उड़ने लगी थी,
हां आंखों में नींद थी ,
पर नींद नहीं आ रही थी।
- kratiz
